The Unreleased and The Unknown - Part 4 - Kissa Kursi Ka (1978)



'किस्सा कुर्सी का' अमृत नहाता द्वारा निर्देशित एक 'बेहतरीन' फिल्म है. फिल्म इमरजेंसी के दौरान बनाई गई थी और 1977 में भारत सरकार ने फिल्म के सारे प्रिंट्स (जितने हो सके) जला डाले थे. वजह साफ़ थी, फिल्म पहले राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोल कर रखती है और फिर उसे  फ्रेम-दर-फ्रेम  उधेड़  कर उसकी धज्जियां उड़ाती है.  हालाँकि गुड़गाँव में मारुती फैक्ट्री में फिल्म के प्रिंट जला देने के बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया था  कि फिल्म के प्रिंट सुरक्षित किए जाएं और उसे रिलीज़ किया जाए, और इसी कृपा से फिल्म लोगों तक पहुँच सकी. 


फिल्म साफ़ है, सुथरी है, दुखी करने वाली है, Depressing है और बेहद जबरदस्त है... क्यूंकि 'किस्सा कुर्सी का'  एक इमानदार सिनेमा है. फिल्म संजय गाँधी के मारुती उद्योग केस, कॉन्ग्रेस  और राजनीति के समूचे सिस्टम पर पर एक उम्दा व्यंग है. 
संजय गाँधी 'तीस-हजारी' कोर्ट से बहार आते हुए 
फिल्म की पृष्ठभूमि और सन्दर्भ से आपको परिचित करने के लिए यह बता दूं की 'मारुती उद्योग' को संजय गांधी ने जन्म दिया था, जो की एक उम्दा बात थी, लेकिन गौर-तलब बात ये भी थी की उनके रहते मारुती उद्योग ने एक भी गाड़ी नहीं बनाई थी और इसी सिलसिले में उन पर भ्रष्टाचार के आक्षेप भी  लगाए गए थे  जब यह फिल्म आई तो उसमें प्रतीकों के ज़रिये इस बात पर  करारा  व्यंग कसा गया था. (मसलन फिल्म में प्रेसिडेंट गंगू का चुनाव चिन्ह 'People's Car' थी जो की संजय गांधी का महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट था). 


 फिल्म से जुड़ने के लिए,पहले, जून 15,1977 को इंडिया टुडे में छपी रिपोर्ट   का एक अंश पढ़ें - 
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THE CASE OF A MISSING FILM - By Dilip Bobb, Mandira Purie and Suchitra Behal


 "It is poetic justice that, among all his alleged sins, Sanjay Gandhi finds himself behind bars for a case that has aroused the least public interest. Sanjay, along with Indira Gandhi's former information and broadcasting (I&B) minister V.C. Shukla, is facing trial for allegedly destroying the prints of a Hindi feature film Kissa Kursi Ka (KKK), produced by Janata Party MP, Amrit Nahata. Most people are under the mistaken impression that Sanjay's alleged destruction of the KKK prints is a relatively minor offence. However, if convicted, both Sanjay and Shukla are liable to a maximum punishment of life imprisonment. In KKK, the main political party had a "people's car" as its election symbol-an obvious take-off on Sanjay's dubious Maruti car project.....KKK was sent to a seven-member revising committee by the Censor Board and further on to the Central Government by the committee. The I&B ministry sent Nahata a showcause notice which listed a total of 51 objections to his film....Shukla ordered that the film, including the original negatives, be seized."
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अब हम फिल्म की बात करते हैं. मैं कोमल नहाता, तरन आदर्श, या फिर खालिद मोहोम्मद बनकर इस फिल्म का रिव्यू नहीं लिख रहा हूँ. मैं बस अपनी बात कह रहा हूँ क्योंकि मैं दिल से चाहता हूँ  कि आप लोग यह फिल्म देखें. 'किस्सा कुर्सी का'  फिल्मों की उस श्रेणी में आती है जिसमें एक भी सीन फ़ालतू नहीं होता, एक भी हरकत 'यूं-ही' नहीं कर दी जाती और छोटा से छोटा 'सिम्बल' भी बिना सोचे समझे जबरदस्ती नहीं रख दिया जाता. कुछ लोग कह सकते हैं की फिल्म 'Technically Sound' नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता  कि ऐसी फिल्म बनाते वक्त, बनाने वाले के मन में 'तकनीकि' प्राइमरी लिस्ट में ज़रा भी होती है.  ऐसी फिल्मों का तकनीकि होती है - सन्देश देना' और 'बात कहना'  - और उसे यह फिल्म बखूबी निभाती है. 
फिल्म अपनी एक एक बात Symbols के ज़रिए कहती है. यहाँ तक  कि  किरदारों के नाम भी Symbolic हैं. मसलन - देशपाल (प्रेसिडेंट का सलाहकार), जनता (शबाना आज़मी, आम जनता के रूप में) और जन-गन देश (एक काल्पनिक देश).  


Symbols कितने सटीक हैं ये समझाने की लिए फिल्म के कुछ कुछ-एक सीन की बात करता हूँ - 
1. फिल्म में एक सीन है जब फिल्म के लीड किरदार, प्रेसिडेंट गंगू, को बहोत भयंकर पेट दर्द और कान दर्द की शिकायत होती है. जांच-पड़ताल के बाद डॉक्टर कहता है कि, जनता की चीख पुकार सुन कर आपके कानों का पर्दा फट गया है. आपके कानों को तेल की नहीं, संगीत की जरुरत है...आपको पानी पीना मना है, आप सिर्फ  Scotch Whiskey पीजिए. आप कानों के लिए सुर, जिगर के लिए  सुरा और आँखों के लिए सुंदरी का सेवन करें...और यदि आपको तुरंत ठीक होना है तो आप जल्दी से कोई भाषण दीजिए और उदघाटन करिए, तुरंत आराम पड़ जाएगा. 


2. फिल्म में शबाना आज़मी ने एक गूंगी का किरदार अदा किया है और गूंगी का नाम है 'जनता'. ज़ाहिर सी बात है कि जनता राजनीति में गूंगी ही होती है. फिल्म के एक सीन में जनता को भी पेट दर्द की शिकायत होती है. डॉक्टर जांच पड़ताल के बाद बताता है कि तुम्हें गरीबी का रोग हो गया है...  इस रोग में खाना खाना मना है, ग़म खा सकती हो, गाली खा सकती हो, धक्के खा सकती हो, गोते खा सकती हो. दावा दारू मना है, पढना लिखना मना है...इस बीमारी में घुट-घुट कर मरने कि इजाज़त है लेकिन रोना मना है और सबसे बड़ी बात ये हैं कि इस बीमारी में बोलना मना है.


3. फिल्म कई मायनों में 'साहसी' है, जोरदार भी और दूर-दर्शी भी क्यूंकि ये conspiracy theories की बात कहती है.   उदाहरण  के तौर पर, प्रेसिडेंट गंगू  अपने पड़ोसी देश 'अंधेर नगरी' के राजा के पास जाकर कहता है कि तुम्हारी जनता तुमसे नाराज है और हमारी जनता हमसे. ना तो तुम्हारे पास उनकी समस्याओं का हल है और ना ही मेरे पास इनकी समस्याओं का. इसलिए चलो हम लोग लड़ाई की घोषणा करते हैं. इससे लोगों का ध्यान गरीबी और पेट से हटकर देशभक्ति में लग जाएगा.  तुम  हम पर थूकना और हम तुम पर थूकेंगे. तुम हमारे खिलाफ ज़हर उगलना और हम तुम्हारे खिलाफ.15 दिन की लड़ाई लड़ी जाए, देशभक्ति का ये नशा कम से 5 साल तो चलेगा ही और पांच साल तुम्हारी-गद्दी महफूज़ रहेगी ...उसके बाद कोई और खेल खेलेंगे. 


इसी लिए मैंने शुरुआत में कहा था कि किस्सा कुर्सी का'  फिल्मों की उस श्रेणी में आती है जिसमें एक भी सीन फ़ालतू नहीं होता, एक भी हरकत 'यूं-ही' नहीं कर दी जाती और छोटा से छोटा 'सिम्बल' भी बिना सोचे समझे जबरदस्ती नहीं रख दिया जाता.


फिल्म देखते वक़्त आपको मीरा का किरदार सोनिया गाँधी के किरदार (कॉंग्रेस की चुनावी रणनीति) जैसा लगेगा (हालाँकि सोनिया गाँधी उस समय शासन में नहीं थी) . मीरा का किरदार इस बात को बखूबी रखता है की राजनीति का मतलब सिर्फ चुनाव जीतना नहीं बल्कि उससे ज्यादा चुनाव  जिताना है. इसीलिए मीरा एक मदारी के जमूरे को प्रेसिडेंट पद का उम्मीदवार बनाती है (जो संजय संजीवनी बेचता हुआ दिखाया गया है).
मीरा एक जमूरे को प्रेसिडेंट के रूप में तैयार करती हुई 
गौर-तलब बात यह है की फिल्म को कोँग्रेस को उखाड़ फेंकने और संजय गाँधी के विरुद्ध जनमत इकठ्ठा करने में महत्वपूर्ण माना गया था. फिल्म के 1977 में रिलीज़ के बाद जनता पार्टी की सरकार आई थी. 

मार्च 26, 1977 को जनता पार्टी सपोर्टर्स
अपनी तरफ से मैंने अपनी बात कह दी है. बहुत संभव है कि मैं थोडा और बेहतर ढंग से कह सका होता. लेकिन मेरा ख़याल है कि मैं इतना जरुर कह पाया हूँ कि आपको यह फिल्म देखनी चाहिए. ये फिल्म राजनीति का कच्चा-चिट्ठा समझने के लिए देखिए, मनोहर सिंह, सुरेखा सीकरी और शबाना आज़मी की बेहतरीन अदाकारी के लिए देखिए और कोमल नहाता के संघर्ष के लिए देखिए. फिल्म थोड़ा भारी ज़रूर है लेकिन ठीक उतनी ही भारी है जितना कि सच होता है.  


ये रहा फिल्म देखने का लिंक - 


और अंत में कोमल नहाता के  कुछ  दुर्लभ  पन्ने हैं, जो फिल्म के बारे में और रोमांचक एवं अंदरूनी जानकारी देते हैं. पढ़ा जा सकता है  - 



बाकी का पढने के लिए इधर  क्लिक करें 

2 comments:

{ Ashish Tickoo } at: June 19, 2012 at 9:58 AM said...

Dekhni padegi!isko play mein convert karke perform nahi kar sakte?

{ Rahul } at: June 24, 2012 at 12:14 AM said...

Awesome post ... informative.

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